जैन धर्म का 'अनेकांतवाद' (Anekantavada) और Cancel Culture: Social Media के दौर में विचारों की आज़ादी का प्राचीन मॉडल
जैन धर्म का 'अनेकांतवाद' (Anekantavada) और : Social Media
एक दिन जब मैंने एक ट्वीट लिखा और 48 घंटे बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं खुद Cancel Culture का हिस्सा बन गया था
बात 2021 की है। कोई एक्टर कुछ बोल रहा था — मैंने उसके एक पुराने इंटरव्यू का 10 सेकंड का क्लिप ट्वीट किया। लिखा — "देखो कैसी सोच है।"
ट्वीट वायरल हुआ। 5000 रिट्वीट। लोग मुझे टैग करके लिख रहे थे — "सही कहा भाई, इसको तो कोई काम नहीं देना चाहिए।"
मुझे अच्छा लग रहा था। मैं "सही" पक्ष में था।
तीसरे दिन मुझे उस एक्टर का पूरा इंटरव्यू मिला। 47 मिनट का। मैंने सारा सुना। उसने जो 10 सेकंड का क्लिप था, उससे पहले वो 4 मिनट कुछ और बोल रहा था। अगले 6 मिनट में उसने खुद अपनी पहली बात को सुधारा था।
मेरा ट्वीट उसके 10 सेकंड का सबसे बुरा हिस्सा था। बाकी का 47 मिनट मैंने नहीं दिखाया था।
मैंने वो ट्वीट डिलीट कर दिया। लेकिन तब तक 5000 लोग उसे रिट्वीट कर चुके थे। उस एक्टर को मिले गालियों के 5000 कारण मैं बन चुका था।
उस रात मैं बैठा और सोचा — ये क्या कर रहे हैं हम सब?
जब मैंने जैन मंदिर के उस कोने में बैठकर पहली बार "अनेकांत" सुना — और मेरा गुस्सा पिघल गया
एक बेचैन मन और एक साधु की कहानी
मैं उस घटना के बाद कई दिनों तक परेशान रहा। एक दोस्त ने कहा — "चल, जैन मंदिर चलते हैं। वहाँ एक साधु रोज़ शाम को बात करता है।"
मैं गया। साधु ने उस दिन कहानी सुनाई:
चार अंधे आदमी हाथी को छू रहे थे। एक ने सूंड छुई — कहा, हाथी साँप जैसा है। दूसरे ने पैर छुआ — कहा, हाथी खंभे जैसा है। तीसरे ने कान छुआ — कहा, हाथी पंखे जैसा है। चौथे ने पीठ छुआ — कहा, हाथी दीवार जैसा है।
सब अपनी-अपनी बात पर अड़े। झगड़ा होने लगा।
साधु ने कहा — "ये चारों गलत नहीं थे। बस अधूरे थे। और अधूरे को पूरा समझ लेना — यही सबसे बड़ी गलती है।"
मैंने उस दिन समझा — मैं उस एक्टर के 10 सेकंड को पूरा सच समझ बैठा था। मैं अंधों में से एक था। बस मैंने सूंड छुई थी, और पूरे हाथी पर फतवा लगा दिया था।
ये "स्याद्वाद" नाम की चीज़ — जो आपकी हर राय को अस्थायी वीज़ा देती है
"स्यात" — एक शब्द जो अहंकार तोड़ देता है
जैन दर्शन की सबसे बड़ी देन है स्याद्वाद। "स्यात" का मतलब है — "शायद", "किसी दृष्टि से", "एक कोण से"।
स्याद्वाद कहता है — जब तुम कुछ कहो, तो उसके आगे "स्यात" लगाओ। "स्यात, ये सच है।" यानी — ये पूरा सच नहीं है, ये एक कोण है।
"स्यात् सर्वं भवति जगति न किंचिदेकान्ततः"
(दुनिया की हर चीज़ एक कोण से होती है, एकांत से नहीं)
मैंने सोचा — क्या मैं अपने हर ट्वीट के आगे "स्यात" लगा सकता हूँ? "स्यात, ये आदमी गलत है।" "स्यात, ये फिल्म बेकार है।"
तुरंत लगा — अरे, तो फिर मेरी राय का जोर कम हो जाएगा। लोग कम रिट्वीट करेंगे।
और फिर मैंने देखा — यही तो समस्या है। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उन्हीं को बढ़ाता है जो बिना "स्यात" के बोलते हैं। जो 10 सेकंड के क्लिप को "पूरा सच" बेचते हैं।
स्याद्वाद उस एल्गोरिदम का जहर है। क्योंकि ये कहता है — धीरे बोलो, थोड़ा कम बोलो, और बोलते हुए ये मानकर चलो कि तुम गलत भी हो सकते हो।
तीन चीज़ें जो मैंने उस साधु से सीखीं (और जो किसी किताब में नहीं मिलीं)
पहली: "अनेकांत" का मतलब "सब ठीक है" नहीं है
मैंने पूछा — "गुरुजी, तो क्या हर किसी की बात सही है?"
उन्होंने कहा — "नहीं। अनेकांत का मतलब है — पहले सुनो, फिर तय करो कि उसमें कितना सच है। अगर पूछो — 'ये आदमी चोर है?' तो एक कोण से वो चोर हो सकता है (उसने एक बार चोरी की), दूसरे कोण से वो चोर नहीं (उसने सजा काट ली, अब ईमानदार है)। तुम्हारा फैसला उसी पर आधारित होना चाहिए कि तुम किस कोण से देख रहे हो। पर ये मत कहो कि 'चोरी सही है'।"
दूसरी: सात भंगों का असली उपयोग — अपने दिमाग को ट्रेनिंग देना
साधु ने कहा — सात भंग कोई फॉर्मूला नहीं है जिसे तुम हर बात पर लगाओ। ये दिमाग की कसरत है। जैसे जिम जाते हो, वैसे ही रोज़ सात भंगों में से किसी एक पर ध्यान दो। धीरे-धीरे तुम्हारा दिमाग खुद-ब-खुद किसी भी बात को एक से ज्यादा कोणों से देखने लगेगा।
तीसरी: सबसे मुश्किल भंग है चौथा — "अवक्तव्य"
"अवक्तव्य" का मतलब — ये बात कही नहीं जा सकती। यानी, कुछ मामलों में तुम्हारे पास पर्याप्त जानकारी नहीं है, तो चुप रहना ही सबसे बड़ी ईमानदारी है।
सोशल मीडिया पर सबसे मुश्किल काम है — चुप रहना। जब हर कोई कुछ न कुछ बोल रहा हो, तब "अवक्तव्य" कहना — यानी "मैं अभी कुछ नहीं कह सकता" — ये सबसे बहादुरी का काम है।
Cancel Culture को अनेकांतवाद कैसे ध्वस्त करता है — एक छोटी सी तालिका देख लीजिए
Cancel Culture क्या करता है?
किसी के एक वाक्य को पकड़कर पूरा इंसान परिभाषित कर देता है
"हम सही हैं, बाकी गलत" — ये मानकर चलता है
जो सहमत नहीं, उसे साइलेंट कर देता है
फैसला सेकंडों में, बिना संदर्भ के
गलती साबित होने पर भी माफ़ी नहीं माँगता
अनेकांतवाद क्या कहता है?
हर इंसान कई परतों से बना है। एक वाक्य उसकी पूरी पहचान नहीं
"हमारे पास सच का एक हिस्सा है, बाकी के पास दूसरा हिस्सा"
असहमति को एक और कोण मानता है, उसे सुनता है
फैसले से पहले सात कोणों से देखने की माँग करता है
गलती को सीखने का मौका मानता है
वो दो दार्शनिक झगड़े जिनसे अनेकांतवाद बचना चाहता था
पहला झगड़ा: शंकराचार्य से
शंकराचार्य ने कहा — ब्रह्म एक है, बाकी सब मिथ्या। यानी एक ही अंतिम सच है।
जैन विद्वानों ने कहा — अगर एक ही सच है, तो दुनिया के सारे अनुभव झूठे हो गए। जो आदमी भूखा है, उसकी भूख का अनुभव — क्या वो मिथ्या है? अगर हाँ, तो उसे खाना क्यों दें?
अनेकांतवाद ने बीच का रास्ता निकाला — एक परम सच हो सकता है, लेकिन हम उसे सीधे नहीं जान सकते। हम सिर्फ उसके कोणों को जान सकते हैं। और हर कोण उतना ही सच है जितना दूसरा।
दूसरा झगड़ा: बौद्ध "क्षणिकवाद" से
बौद्ध दर्शन कहता है — सब कुछ हर पल बदलता है, कोई स्थायी चीज़ नहीं।
जैन कहते हैं — सब बदलता है, ये भी एक कोण है। दूसरा कोण ये भी है कि कुछ स्थायी भी है। तुम आज जो हो, कल भी वही हो — बदले भी हो, वही भी हो। दोनों सच हैं।
ये दोनों झगड़े आज भी चल रहे हैं। बस नाम बदल गए हैं — अब ये "लिबरल बनाम कंजर्वेटिव" है, "फेमिनिस्ट बनाम एंटी-फेमिनिस्ट" है। हर पक्ष कहता है — सिर्फ मैं सही हूँ।
अनेकांतवाद कहता है — तुम दोनों के पास सच का एक हिस्सा है। अब बैठो और बाकी हिस्से भी देखो।
विचार प्रयोग: तुम्हारा सबसे करीबी दोस्त Cancel हो गया। अब तुम क्या करोगे?
मान लो — तुम्हारा बचपन का दोस्त। उसने 10 साल पहले कहीं कुछ लिखा था। अब वो वायरल हो गया। लोग उसे नौकरी से निकालने की माँग कर रहे हैं।
तुम जानते हो — वो आज वैसा नहीं है। उसने वो बात 10 साल पहले कही थी, उसका मतलब कुछ और था, संदर्भ अलग था।
अब तुम्हारे सामने चार विकल्प हैं:
उसका साथ छोड़ दो — कहीं तुम भी Cancel न हो जाओ।
खुलकर उसका बचाव करो — भले ही तुम्हें गालियाँ पड़ें।
चुप रहो — न साथ दो, न विरोध करो।
उससे कहो — माफ़ी माँग ले, चाहे गलती हो या न हो।
अनेकांतवाद कहेगा — इन चारों में से कोई भी पूरा सच नहीं है। हर विकल्प के अपने कोण हैं। असली सवाल है — तुम किस कोण से देख रहे हो? दोस्ती के कोण से? सच के कोण से? सुरक्षा के कोण से?
और सबसे बड़ी बात — तुम्हारा फैसला चाहे जो भी हो, उसके साथ "स्यात" लगाकर चलो। "स्यात, मैंने सही किया।" यानी — हो सकता है कि मैं गलत हूँ, लेकिन इस समय यही मेरा सबसे ईमानदार फैसला है।
7 दिनों का "स्यात" चैलेंज — जो तुम्हारी सोच का ढाँचा बदल देगा
मैंने खुद ये किया था। एक हफ्ते तक हर राय से पहले "स्यात" लगाया।
दिन 1-2
सिर्फ लिखते समय "स्यात" लगाया। ट्वीट करने से पहले देखा — क्या मैं इसके आगे "स्यात" लगा सकता हूँ? अगर नहीं लगा सकता, तो वो ट्वीट नहीं किया।
दिन 3-4
बोलते समय "स्यात" लगाने की कोशिश की। दोस्तों के बीच कहा — "स्यात, ये सही होगा।" पहले लोग हँसे। फिर खुद हँसने लगे।
दिन 5-7
अपने अंदर की बातों पर "स्यात" लगाया। "स्यात, मैं सही हूँ।" "स्यात, मैं गलत हूँ।" ये सबसे मुश्किल था। क्योंकि अपने आप को संदेह में रखना बहुत असहज होता है।
लेकिन हफ्ते के अंत तक मैंने देखा — मैं उन चीज़ों पर उतना गुस्सा नहीं हो रहा था जिन पर पहले होता था। क्योंकि गुस्सा तब आता है जब हमें पूरा यकीन होता है कि हम सही हैं। "स्यात" ने वो यकीन थोड़ा ढीला कर दिया था।
वो तीन छुपे हुए तथ्य जो अकादमिक किताबों में भी नहीं मिलते
1. अनेकांतवाद का असली नाम "अहिंसा का दार्शनिक आधार" है
जैन धर्म में अहिंसा सिर्फ शारीरिक नहीं है। सबसे बड़ी हिंसा है — किसी की बात को बिना सुने काट देना। अनेकांतवाद उस हिंसा को रोकने का दार्शनिक उपकरण है। जब तुम कहते हो "स्यात", तो तुम दूसरे के दृष्टिकोण को जीने का स्थान दे रहे हो। ये अहिंसा का सबसे गहरा रूप है।
2. 20वीं सदी में ये दर्शन "पोस्टमॉडर्निज़्म" से टकराया
फ्रांसीसी दार्शनिकों ने जब कहा — "कोई परम सच नहीं, सब सापेक्ष है" — तो भारतीय विद्वानों ने कहा — ये तो हमारा अनेकांतवाद है। लेकिन जैन विद्वानों ने फर्क बताया — पोस्टमॉडर्निज़्म कहता है "सच नहीं होता", अनेकांतवाद कहता है "सच होता है, लेकिन वो अनेक कोणों से दिखता है"। ये फर्क बहुत बड़ा है।
3. अनेकांतवाद ने अपने ही सिद्धांत को तोड़ा
8वीं शताब्दी में जैन विद्वान आचार्य विद्यानंद ने लिखा — अगर अनेकांतवाद खुद एक "एकांत" (एकतरफा) सिद्धांत है, तो वो खुद का खंडन करता है। उन्होंने कहा — इसलिए अनेकांतवाद कोई "सिद्धांत" नहीं, बल्कि एक "विधि" है। जैसे कोई सीढ़ी कहीं ले जाती है, लेकिन सीढ़ी खुद मंज़िल नहीं होती।
मैं अब भी Cancel Culture से नफरत करता हूँ — बस अब उससे अलग तरह से नफरत करता हूँ
पहले मैं Cancel Culture से नफरत करता था — और खुद Cancel करने वालों में शामिल हो जाता था। हाँ, बड़ा विरोधाभास है।
अब मैं Cancel Culture से नफरत करता हूँ — लेकिन किसी को Cancel नहीं करता। क्योंकि मैंने देख लिया — Cancel करने वाला और Cancel होने वाला, दोनों एक ही गेम खेल रहे हैं। और वो गेम है — "मैं पूरा सच हूँ, तू अधूरा।"
अनेकांतवाद ने मुझे वो गेम छोड़ने की ताकत दी। अब जब कोई मुझसे कहता है — "वो गलत है, उसे Cancel करो" — तो मैं पूछता हूँ — "किस कोण से गलत?"
कभी-कभी सामने वाला जवाब देता है। कभी-कभी गाली देकर चला जाता है। लेकिन मैं शांत रहता हूँ।
क्योंकि मुझे पता है — मैं भी अंधा हूँ। बस अब मैं हाथी के एक से ज्यादा हिस्से छूने की कोशिश करता हूँ।
एक आखिरी बात — जो मैं उस साधु से पूछना भूल गया था, और अब खुद जवाब ढूँढ लिया
मैंने साधु से पूछा था — "गुरुजी, अनेकांतवाद मानने वाला आदमी कभी गुस्सा नहीं करता?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा — "करता है। पर उसका गुस्सा भी 'स्यात' के साथ होता है। वो कहता है — 'स्यात, मैं गुस्सा हूँ।' यानी — ये गुस्सा भी एक कोण है। पूरा सच नहीं।"
मैं उस दिन वो बात समझ नहीं पाया था। अब समझ गया हूँ।
जब मैं गुस्सा होता हूँ, तो मैं खुद से कहता हूँ — "स्यात, ये गुस्सा सच है। स्यात, ये गुस्सा गलत है। स्यात, ये गुस्सा काम का है। स्यात, बेकार है।"
गुस्सा रहता है। पर वो मुझे खाने नहीं दौड़ता।
Cancel Culture का सबसे बड़ा हथियार है — गुस्से को "पूरा सच" बेचना। अनेकांतवाद का सबसे बड़ा हथियार है — गुस्से को "स्यात" कहना।

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