मीमांसा दर्शन (Mimamsa) और Indian Constitution: जर्मीनी के प्राचीन सूत्र आधुनिक भारतीय न्याय व्यवस्था में कैसे ज़िंदा हैं?
मीमांसा दर्शन (Mimamsa) और Indian Constitution सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका, और मैंने सोचा — क्या ये कोई प्राचीन मीमांसक लिख रहा था? मैं उस दिन सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर केस डायरी पढ़ रहा था। एक याचिका में लिखा था — "अनुच्छेद 21 की व्याख्या में जीवन के अर्थ को संकुचित नहीं किया जा सकता। शब्दों का वही अर्थ ग्रहण किया जाए जो विधायिका के मन में था।" मैं ठिठक गया। ये वही भाषा थी जो मैंने जैमिनी के मीमांसा सूत्र में पढ़ी थी। वहाँ लिखा है — "शब्दस्यार्थस्य च संबंधः स्थितः" (शब्द और उसके अर्थ का संबंध स्थिर है)। विधायिका का मतलब बदलता नहीं, उसे ढूँढ़ना होता है। मैंने सोचा — क्या हमारा संविधान, हमारी अदालतें, हमारी कानूनी सोच — सब कुछ उसी दर्शन पर चल रहा है जिसे हम "सिर्फ यज्ञ का दर्शन" समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं? पहली बात: मीमांसा यज्ञों का दर्शन नहीं, व्याख्या का दर्शन है मैं भी उन लोगों में था जो मीमांसा सुनते ही कहते — "हाँ-हाँ, यज्ञ-हवन वाला दर्शन।" फिर एक दिन मैंने मीमांसा सूत्र का पहला अध्याय खोला। जैमिनी लिख रहे हैं — "अथातो धर्मज...